दिल्ली पुलिस के जवानों ने वकीलों के दबाव में एसीपी और इंस्पेक्टर के निष्क्रिय यूनिटों में तबादले के विरोध में पुलिस मुख्यालय का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों ने इस कार्रवाई को अनुचित बताते हुए उच्च अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की, जिससे महकमे में हड

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में सोमवार को पुलिस विभाग के भीतर पनप रहा असंतोष खुलकर सामने आ गया। वकीलों के दबाव में पूर्वी दिल्ली के एक एसीपी और इंस्पेक्टर का निष्क्रिय इकाइयों में तबादला किए जाने के विरोध में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय का घेराव कर दिया। जवानों ने इस कार्रवाई को अनुचित बताते हुए कहा कि इससे पूरे पुलिस बल का मनोबल और सम्मान प्रभावित होता है। हालात ऐसे बने कि कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस को अपने ही जवानों के विरोध का सामना करना पड़ा।
सुबह शुरू हुआ प्रदर्शन दोपहर तक उग्र रूप लेने लगा। दिल्ली के अलग-अलग जिलों और पुलिस इकाइयों से जवान मुख्यालय पहुंचने लगे। कई पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में भी वहां पहुंचे। देखते ही देखते मुख्यालय परिसर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी एकत्र हो गए। जवानों ने मुख्यालय के भीतर धरना देकर नारेबाजी शुरू कर दी। पुलिस एकता और अपने अधिकारों के समर्थन में उठती आवाजों से पूरा परिसर गूंज उठा। दिल्ली पुलिस के इतिहास में मुख्यालय के भीतर इस तरह पुलिसकर्मियों का एकजुट होकर विरोध करना असाधारण घटनाक्रम माना जा रहा है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार सहित सभी विशेष पुलिस आयुक्तों को जवानों के साथ बैठक करनी पड़ी। पुलिस मुख्यालय के आदर्श सभागार में आयोजित बैठक में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी शामिल हुए और सभागार पूरी तरह भर गया। मंच पर पुलिस आयुक्त और वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे, जबकि जवानों ने खुलकर अपनी नाराजगी और शिकायतें रखीं। इस दौरान मीडिया कर्मियों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई।
बैठक में पुलिसकर्मियों का मुख्य सवाल था कि वकीलों के साथ विवाद के बाद पुलिस अधिकारियों के तबादले का फैसला किन परिस्थितियों में लिया गया? जवानों का कहना था कि यदि किसी मामले में जांच या कार्रवाई जरूरी है तो वह निष्पक्ष होनी चाहिए, न कि किसी पक्ष के दबाव में। उनका आरोप था कि इस तरह की कार्रवाई से पुलिसकर्मियों में गलत संदेश जाता है और विभाग का मनोबल प्रभावित होता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने पुलिस आयुक्त के सामने तीन प्रमुख मांगें रखीं। पहली, वकीलों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द नहीं की जाए। दूसरी, प्राथमिकी से बार काउंसिल के सदस्य का नाम नहीं हटाया जाए। तीसरी, सोमवार के प्रदर्शन में शामिल किसी भी पुलिसकर्मी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विभाग निलंबन या कोई अन्य सख्त कार्रवाई करना चाहता है तो वह केवल उनके खिलाफ करे, प्रदर्शन में शामिल अन्य जवानों को निशाना न बनाया जाए।
हालांकि, पहले दौर की बैठक में कोई सहमति नहीं बन सकी और पुलिसकर्मी सभागार से बाहर आ गए। कुछ समय बाद दूसरे दौर की बातचीत शुरू होने की सूचना सामने आई। इस बीच अलग-अलग जिलों से जवानों के मुख्यालय पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। महिला पुलिसकर्मियों ने भी बड़ी संख्या में प्रदर्शन में भाग लिया और अपनी नाराजगी जाहिर की। जवानों ने वरिष्ठ अधिकारियों से मामले में हस्तक्षेप कर निष्पक्ष कार्रवाई और पुलिसकर्मियों के सम्मान की रक्षा करने की मांग की।
प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस मुख्यालय और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया गया। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जवानों की नाराजगी दूर करने और स्थिति को सामान्य बनाने की रही। पुलिसकर्मियों का आक्रोश इस बात को लेकर था कि वकीलों की हड़ताल के बाद पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया गया, जबकि उनके पक्ष को भी समान रूप से सुना जाना चाहिए था।
गौरतलब है कि शाहदरा थाने में पुलिसकर्मियों और कड़कड़डूमा अदालत के वकीलों के बीच हुए विवाद के बाद 26 अक्टूबर को वकीलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इसके अगले दिन वकीलों ने पुलिस के खिलाफ काम बंद हड़ताल शुरू कर दी थी, जो दो दिनों तक चली। इसके बाद एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और संबंधित इंस्पेक्टर के तबादले की कार्रवाई हुई। पुलिसकर्मियों के एक वर्ग ने इसे वकीलों के दबाव में लिया गया फैसला बताते हुए विरोध शुरू कर दिया।
दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच टकराव का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले तीस हजारी अदालत परिसर में हुई हिंसा के बाद भी पुलिसकर्मी अपने अधिकारों और सम्मान की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। अब शाहदरा प्रकरण के बाद दोबारा इस तरह का विरोध सामने आने से पुलिस और वकीलों के बीच संबंधों के साथ-साथ पुलिस विभाग की आंतरिक व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं।
फिलहाल सबकी निगाहें पुलिस आयुक्त और जवानों के बीच हुई बातचीत के नतीजे पर टिकी हैं। एसीपी मनस्वी वशिष्ठ की मांगों पर विभाग क्या निर्णय लेता है और प्रदर्शन में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर क्या रुख अपनाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। पूरे मामले का निष्पक्ष समाधान ही पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच बढ़ते तनाव को कम करने तथा विभाग में विश्वास और अनुशासन बनाए रखने का रास्ता खोल सकता है।

