आईपीएस प्रशाखा माथुर का पुलिस करियर इंटेलिजेंस ब्यूरो और विभिन्न अहम पदों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन से भरा रहा है। उन्हें 2022 में राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है। अब वो और उनके पति करप्शन केस को लेकर विवादों में हैं।

जयपुर,एजेंसी। राजस्थान की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था में इन दिनों चर्चित 40 विला-कॉटेज खरीद मामला सुर्खियों में है। कभी अपनी उपलब्धियों, प्रशासनिक दक्षता और उत्कृष्ट पुलिस सेवाओं के लिए पहचान बनाने वाली वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ. प्रशाखा माथुर अब कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़े इस मामले को लेकर चर्चा में हैं। आरोप है कि उन्होंने अपने पति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल के साथ मिलकर ‘अनंता रिसॉर्ट्स’ से बेहद कम कीमत पर 40 लग्जरी विला और कॉटेज खरीदे तथा कंपनी को नियमों में कथित छूट दिलाकर अनुचित लाभ पहुंचाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने पहले आईएएस शिखर अग्रवाल को पदस्थापन की प्रतीक्षा में रखा और बाद में उनकी पत्नी आईपीएस प्रशाखा माथुर को भी एपीओ कर दिया।

इस प्रकरण में सामने आए आरोपों के मुताबिक, प्रशाखा माथुर, उनके पति शिखर अग्रवाल और परिवार के सदस्यों ने लगभग ढाई साल की अवधि में एक ही कंपनी से 40 विला और कॉटेज खरीदे। आरोप है कि इन संपत्तियों की खरीद बाजार मूल्य की तुलना में बेहद कम कीमत पर की गई। साथ ही कंपनी को प्रशासनिक स्तर पर नियमों में राहत और अन्य सुविधाएं देकर लाभ पहुंचाने के आरोप भी लगाए गए हैं। इन आरोपों के सामने आने के बाद मामला केवल संपत्ति खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें संभावित वित्तीय अनियमितताओं और पद के दुरुपयोग से जुड़े पहलुओं की जांच की मांग भी उठने लगी।

मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की कार्रवाई महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दे दी है। इसके बाद एसीबी के लिए मामले की जांच को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया है। जांच एजेंसी आय से अधिक संपत्ति, संपत्ति खरीद में वित्तीय अनियमितताओं और कथित अनुचित लाभ पहुंचाने जैसे पहलुओं की पड़ताल कर सकती है। इस जांच के दायरे में आईपीएस प्रशाखा माथुर की भूमिका भी आ सकती है। हालांकि, किसी भी अधिकारी के खिलाफ आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

इस पूरे प्रकरण ने राजस्थान के प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। एक ओर जहां दोनों अधिकारियों के लंबे प्रशासनिक और पुलिस सेवा के अनुभव की चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े आरोपों ने सरकारी पदों पर बैठे अधिकारियों की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसीबी की जांच में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि विला-कॉटेज की खरीद किन परिस्थितियों में हुई, संपत्तियों का वास्तविक बाजार मूल्य क्या था और कंपनी को कथित रूप से किस प्रकार का लाभ पहुंचाया गया।

डॉ. प्रशाखा माथुर का पुलिस सेवा में लंबा और विविधतापूर्ण करियर रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अलवर शहर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के रूप में की थी। इसके बाद जयपुर के महिला थाना उत्तर में भी सेवाएं दीं। वर्ष 2000 में उन्हें सिरोही जिले का पुलिस अधीक्षक बनाया गया। इसके बाद उन्होंने जोधपुर सीआईडी (एसएसबी), अजमेर जीआरपी, जोधपुर ग्रामीण, बांसवाड़ा और पाली सहित विभिन्न स्थानों पर पुलिस अधीक्षक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। जुलाई 2003 में उन्हें राजस्थान राज्य महिला आयोग का सदस्य सचिव भी नियुक्त किया गया था।

उनका प्रशासनिक अनुभव राजस्थान तक ही सीमित नहीं रहा। वर्ष 2009 में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नई दिल्ली पहुंचीं प्रशाखा माथुर ने खुफिया ब्यूरो में अतिरिक्त उप निदेशक और बाद में उप निदेशक के पद पर काम किया। केंद्रीय खुफिया व्यवस्था में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के बाद वर्ष 2014 में उनकी राजस्थान वापसी हुई। इसके बाद उन्हें जयपुर स्थित पुलिस मुख्यालय में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया।

वर्ष 2020 में उन्हें राजस्थान राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला का निदेशक बनाया गया। इसी वर्ष जुलाई में उन्होंने राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2023 में पुलिस मुख्यालय की पुनर्गठन एवं नियम शाखा से जुड़ी जिम्मेदारी निभाने के बाद सितंबर 2024 में उन्हें एडीजी योजना, आधुनिकीकरण, कल्याण एवं पुनर्गठन बनाया गया। अक्टूबर 2025 में उन्हें एडीजी योजना, आधुनिकीकरण एवं कल्याण के पद पर पदस्थ किया गया था।

पुलिस सेवा में उनके योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है। वर्ष 2011 में उन्हें पुलिस पदक प्रदान किया गया था। इसके बाद वर्ष 2022 में सराहनीय सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया। लंबे समय तक विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं देने और राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने वाली अधिकारी का नाम अब कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में सामने आना प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

फिलहाल इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम भूमिका एसीबी की जांच की होगी। जांच एजेंसी को संपत्तियों की खरीद से जुड़े दस्तावेजों, भुगतान के स्रोत, वास्तविक बाजार मूल्य, कंपनी को मिली कथित रियायतों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल करनी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि क्या संपत्तियों की खरीद और प्रशासनिक निर्णयों के बीच कोई अनुचित संबंध था। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 40 विला-कॉटेज खरीद प्रकरण की जांच में और कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं तथा राजस्थान के इन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई होती है।

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