प्रदोष काल में चतुर्दशी तिथि होने के कारण यम दीपदान, हनुमान पूजा और काली चौदस की पूजा 7 नवंबर को की जाएगी जबकि उदयातिथि के अनुसार 8 नवंबर की सुबह अभ्यंग स्नान होगा।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला नरक चतुर्दशी पर्व दीपोत्सव का दूसरा और महत्वपूर्ण दिन है। इसे छोटी दीपावली, रूप चतुर्दशी, नरक चौदस और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक आस्था, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक मान्यताओं से जुड़ा यह पर्व बुराई पर अच्छाई तथा अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की स्मृति के साथ यमराज की पूजा, दीपदान, हनुमान आराधना और अभ्यंग स्नान की विशेष परंपरा है।
इस वर्ष चतुर्दशी तिथि दो दिन रहने के कारण नरक चतुर्दशी के पूजन और स्नान को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट से प्रारंभ होकर 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। प्रदोष काल में चतुर्दशी तिथि की उपस्थिति के कारण यम दीपदान, हनुमान पूजा और काली चौदस से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान 7 नवंबर को किए जाएंगे, जबकि उदयातिथि के आधार पर 8 नवंबर की सुबह अभ्यंग स्नान किया जाएगा।
नरक चतुर्दशी पर यमराज की पूजा और दीपदान का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन यमराज के निमित्त दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार में सुख-समृद्धि तथा दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। परंपरा के अनुसार, शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाया जाता है। यमराज को मृत्यु का देवता और संयम का अधिष्ठाता माना गया है। इस दिन उनकी आराधना के साथ धर्मराज चित्रगुप्त का पूजन भी किया जाता है। मान्यता है कि यमराज की कृपा से मनुष्य को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है।
इस पर्व पर अभ्यंग स्नान की भी विशेष परंपरा है। मान्यता है कि सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाकर उबटन करने के बाद स्नान करने से आरोग्य, सौंदर्य और सकारात्मकता की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करने की परंपरा को आलस्य त्यागने, स्वच्छता अपनाने और अनुशासित जीवन जीने का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई कर कूड़ा-कचरा बाहर निकालने और शाम को दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। कई क्षेत्रों में रामभक्त हनुमान की विशेष पूजा-अर्चना भी की जाती है। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इस दिन हनुमान जयंती मनाने की परंपरा भी प्रचलित है, हालांकि हनुमान जयंती का प्रमुख पर्व चैत्र पूर्णिमा को मनाया जाता है।
नरक चतुर्दशी के साथ भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर अत्यंत अत्याचारी और अहंकारी हो गया था। वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर देवताओं, ऋषि-मुनियों और पृथ्वीवासियों को परेशान करता था। उसने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना रखा था। उसके अत्याचारों से परेशान देवताओं और ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का वध कर बंदी बनाई गई कन्याओं को मुक्त कराया। नरकासुर के आतंक से मुक्ति मिलने की खुशी में देवताओं और पृथ्वीवासियों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया। धार्मिक मान्यता है कि तभी से नरक चतुर्दशी मनाने की परंपरा शुरू हुई।
इस पर्व से भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की कथा भी जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर महादानी राजा बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा था। इसके बाद उन्होंने अपने विराट स्वरूप से तीन पगों में पृथ्वी, आकाश और पाताल को नाप लिया। भगवान विष्णु राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न हुए और उन्हें पाताल लोक का शासन सौंपते हुए विशेष आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि इसी प्रसंग की स्मृति में धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीपावली के अवसर पर तीन दिनों तक दीपदान करने की परंपरा चली आ रही है। दीप प्रज्वलन को यम यातना से मुक्ति, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की कामना से भी जोड़ा जाता है।
नरक चतुर्दशी का संदेश केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर की नकारात्मकता, अहंकार, आलस्य और बुराइयों को दूर करने की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार एक छोटा-सा दीपक अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार सदाचार, संयम, विवेक और सकारात्मक सोच जीवन को बेहतर बना सकती है। स्वच्छता, अनुशासन और सद्भाव का संदेश देने वाला यह पर्व दीपावली के उल्लास को आगे बढ़ाते हुए लोगों को जीवन में अच्छाई और प्रकाश अपनाने की प्रेरणा देता है।

