उत्तर प्रदेश में दीवाली का त्योहार सूरन की सब्जी, दीपदान और अलैया-बलैया जैसी अनूठी परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यहां लक्ष्मी-गणेश पूजन की विधि और आवश्यक सामग्री की जानकारी लें।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीपावली का पर्व पूरे देश में श्रद्धा, उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में इससे जुड़ी लोक परंपराएं इस त्योहार को एक अलग पहचान देती हैं। महीनों पहले शुरू होने वाली घरों की साफ-सफाई, दीपों से जगमगाते आंगन, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा तथा घर की बुरी नजर उतारने की परंपरा तक, यहां दीपावली का उत्सव धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति का सुंदर संगम दिखाई देता है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में दीपावली के दिन सूरन यानी जिमीकंद की सब्जी बनाना भी परंपरा का अहम हिस्सा माना जाता है।

उत्तर प्रदेश के अनेक परिवारों में दीपावली के दिन सूरन की सब्जी बनाने की विशेष परंपरा है। त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में इसकी मांग बढ़ जाती है। लोकमान्यता के अनुसार, सूरन जमीन के भीतर उगता है और इसे काटने के बाद भी दोबारा उगाया जा सकता है। इसी विशेषता को निरंतर वृद्धि, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि दीपावली के दिन घर में सूरन की सब्जी बनाने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। हालांकि, यह परंपरा क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग-अलग रूप में निभाई जाती है।

दीपावली की शाम दीपदान का भी विशेष महत्व है। घरों के मुख्य द्वार, आंगन, छत, बालकनी, तुलसी के पौधे और पूजा स्थल पर दीपक जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में गोधूलि बेला के समय गंगा मैया के नाम से सात दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। इसके अलावा मंदिरों, नदियों और अन्य पवित्र स्थलों पर दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि दीप जलाने से घर में सकारात्मकता, सुख और शांति का वातावरण बनता है।

कई परिवारों में दीपावली के अवसर पर घर की बुरी नजर उतारने के लिए अलैया-बलैया की परंपरा भी निभाई जाती है। इसमें लोकरीति के अनुसार घर के सदस्यों और परिवार की सुख-समृद्धि की मंगलकामना की जाती है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक और ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा है।

दीपावली की शाम माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष विधान है। मान्यता के अनुसार, शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजन करने से घर में सुख-समृद्धि और मंगल बना रहता है। पूजा के लिए सबसे पहले घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई की जाती है। इसके बाद एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। परंपरा के अनुसार, माता लक्ष्मी की प्रतिमा भगवान गणेश के दाहिनी ओर रखी जाती है।

पूजन के दौरान दोनों देवताओं को फूल और माला अर्पित की जाती है। माता लक्ष्मी को कमल का फूल और पान के पत्ते चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद धूप और दीप जलाकर सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन किया जाता है और फिर माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है। श्रद्धालु मंत्रों का जाप करते हैं और परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती करते हैं। पूजा के अंत में परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की जाती है। माता लक्ष्मी को खीर तथा भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाने की भी परंपरा है।

लक्ष्मी-गणेश पूजन के लिए पहले से ही आवश्यक सामग्री जुटा लेना बेहतर रहता है। पूजा में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं, रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, मौली, फूल, माला, कमल का फूल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, नारियल, आम के पत्ते, गंगाजल, धूप, दीपक, घी, रुई की बाती, कपूर, मिठाई, फल, खील और बताशे जैसी सामग्री रखी जाती है। पूजन की थाली सजाकर सभी सामग्री व्यवस्थित कर लेने से पूजा के समय किसी तरह की असुविधा नहीं होती।

इस तरह उत्तर प्रदेश में दीपावली केवल दीप जलाने और लक्ष्मी-गणेश की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक खानपान, लोकविश्वास और पारिवारिक रीति-रिवाजों से जुड़ा उत्सव भी है। सूरन की सब्जी से लेकर गंगा के नाम दीपदान और अलैया-बलैया की परंपरा तक, हर रीति इस पर्व को स्थानीय संस्कृति से जोड़ती है। यही विविधता उत्तर प्रदेश की दीपावली को खास बनाती है और नई पीढ़ी तक पुरानी परंपराओं की विरासत पहुंचाती है।

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