सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है।

नई दिल्ली,एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि पिछले दो दशकों में देश की जनसांख्यिकीय स्थिति में बड़ा बदलाव आया है और घटती प्रजनन दर के मौजूदा दौर में जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर लागू ऐसे प्रतिबंधों पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है। अदालत ने इस संबंध में 2003 के चर्चित ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों के नियम को संवैधानिक मान्यता दी थी, तब भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) लगभग 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह दर 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे है। प्रतिस्थापन स्तर वह प्रजनन दर है, जिस पर एक पीढ़ी अपनी संख्या को अगली पीढ़ी के माध्यम से लगभग बनाए रख सकती है।
अदालत ने कहा कि प्रजनन दर में लगातार गिरावट के कारण आने वाले समय में देश को जनसांख्यिकीय बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। इससे आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ने और कामकाजी उम्र के लोगों का अनुपात घटने की आशंका है। ऐसे में जनसंख्या वृद्धि को सीमित करने के उद्देश्य से बनाए गए कानूनों की मौजूदा परिस्थितियों में प्रासंगिकता पर विचार करना जरूरी है।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने फैसले में टिप्पणी की कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंडित करने वाले कानूनों का आधार अत्यधिक जनसंख्या का भय था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों ने इस तर्क को नए सिरे से परखने की जरूरत पैदा कर दी है। अदालत ने आगाह किया कि इन बदलावों की अनदेखी करने पर देश को भविष्य में गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
पीठ ने यह भी चिंता जताई कि दो बच्चों की सीमा लागू रहने से नागरिकों का एक पूरा वर्ग स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित हो सकता है। अदालत के अनुसार, केवल बच्चों की संख्या के आधार पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना उसके सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है। इसलिए ऐसे प्रतिबंधों के औचित्य की नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 2003 के ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ फैसले पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता जताई। उस समय तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
इसी मामले से जुड़े महाराष्ट्र के एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता को भी रद्द कर दिया। उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के कारण अयोग्य घोषित किया गया था। इस कानून में 13 सितंबर 2000 से लागू संशोधन के जरिए दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने से स्थानीय निकाय चुनावों में लागू दो बच्चों की अनिवार्य शर्त पर व्यापक बहस की संभावना है। हालांकि, इस फैसले से देशभर में ऐसे सभी कानून स्वतः समाप्त नहीं हुए हैं। अब बड़ी पीठ इस मुद्दे पर आगे विचार करेगी।

